मुंगेली। छत्तीसगढ़ का पारंपरिक लोकपर्व भोजली शहर सहित क्षेत्र में हर्षोल्लास से मनाया गया। मुंगेली के आगर नदी पुल घाट में पर दोपहर से ही शाम तक भोजली विर्सजन के लिए कतार लगी रही।

लोकपर्व भोजली दोस्ती करने मितान बदने का दिन भी कहते हैं। क्षेत्र में भोजली का विशेष महत्व है। भोजली विसर्जन के बाद मित्रता निभाने के लिए एक-दूसरे के कानों में भोजली लगाकर मितान बनते हैं। छत्तीसगढ़ का फ्रेंडशिप त्योहार परंपरागत रूप से दोस्ती निभाने का पर्व है।

विसर्जन के लिए निकली भोजली

क्षेत्र में भोजली उत्सव धूमधाम के साथ मनाया गया। मुंगेली के मल्हापारा स्थित शंकर मंदिर से बच्चे, युवतियां एवं महिलाएं सिर पर भोजली लेकर निकलीं जो मेनरोड पुराना बस स्टैंड होते हुए आगर नदी पुल घाट पहुंचीं। पुल घाट में भोजली का पूजा-अर्चना कर देवी गंगा-देवी गंगा लहरा तुरंगा, जय हो देवी गंगा… गाते हुए भोजली विसर्जन की गई। इसी प्रका दाउपारा से भी भोजली विसर्जन के लिए निकली।

पुलघाट में मेले जैसा माहौल

शुक्रवार को मुंगेली पुलघाट में भोजली विसर्जन के लिए बड़ी संख्या में लोग पहुंचे। परंपरागत रूप से पुलघाट में मेला जैसा माहौल था। बच्चों से लेकर बड़े सभी पुलघाट में पहुंचे। बाजे-गाजे एवं नए कपड़े पहनकर लोग लोकउत्सव का आनंद लेते रहे। पुलघाट के दोनों ओर विसर्जन करने वालों की भारी भीड़ घंटों तक रही। वहीं लोकपर्व के बाद भी प्रशासन की ओर से पुलघाट की सफाई नहीं कराई गई थी।

सुख-समृद्धि का प्रतीक है पर्व

भोजली को छत्तीसगढ़ की सुख-समृद्धि हरियाली का प्रतीक माना जाता है। भोजली वास्तव में गेहूं का पौधा है, जिसे सावन मास के दूसरे पक्ष की पंचमी से नवमी के बीच किसी पात्र में बोया जाता है। इस पौधे को सूर्य से बचाकर दीपक की रोशनी में रखा जाता है। हल्दी-पानी सींचकर भोजली के पौधे की देखरेख रक्षाबंधन के दिन तक की जाती है। इसके दूसरे दिन भोजली का विसर्जन पारंपरिक उल्लास के साथ किया जाता है।

बच्चों ने निकाली शोभायात्रा

रामगढ़ स्थित सरस्वती शिशु मंदिर के स्कूली बच्चों ने भोजली की शोभायात्रा निकाली। उन्होंने खर्राघाट स्थित आगर नदी में विसर्जित किया। कार्यक्रम में प्रधानाचार्य राजेश नामदेव, आचार्य मनोज साहू, हरि साहू, श्याम यादव, कमलेश प्रधान,पुष्पेंद्र यादव सहित बड़ी संख्या में विद्यालय के लोग छात्र और अभिभावक उपस्थित थे।

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