यह विकास नहीं सांस्कृतिक गुलामी है!

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Language_Cultureयह संयोग नहीं कि हमारे देश के कर्णधार – चाहे वे राजनीति, उद्योग, शिक्षा, आदि किसी क्षेत्र के हों – कभी संस्कृति और भाषा की चर्चा नहीं करते। अवसर कोई हो, उन की चिन्ता या उत्साह का विषय आर्थिक ही होता हैं। और यही बात इस हकीकत का प्रमाण है कि हमारे मध्य वर्ग की प्रतिभा मर गई है। उसे नियति-बोध नहीं रह गया। इस का कारण है।

जो देश अपने ज्ञानियों-मनीषियों का आदर नहीं करता, उस का कल्याण नहीं! भारत आज वैसे ही देशों में है। स्वतंत्र भारत में आरंभ से ही ज्ञानियों, विद्वानों की उपेक्षा हुई। इस की जड़ में पीछे से जारी वह गाँधी-नेहरू मानसिकता थी, जिस में वे स्वयं को ही परम-ज्ञानी भी मानते थे। श्रीअरविन्द या कवि निराला के प्रति उन के व्यवहार से इसे देख सकते हैं। वही व्यवहार आज रामस्वरूप, सीताराम गोयल या कोएनराड एल्स्ट जैसे चिंतकों के साथ है। इस दुर्गति को समझने वाले भी बहुत कम हैं।

नेहरूजी कारखानों को ‘नए भारत के मंदिर’ कहते थे। यह कोई ज्ञान नहीं, राजनीतिक मत था, जिस की पुष्टि की जरूरत भी उन्हें नहीं लगी। तभी से मतवादी ‘प्रगतिशील’ विद्वान कहलाने लगे, जबकि सच्चे विद्वान अपने हाल पर छोड़े भी नहीं गए – उन्हें नेहरूवाद-वामपंथ द्वारा ‘प्रतिक्रियावादी’ (या गाँधीजी द्वारा ‘दिग्भ्रमित’) कहकर लांछित भी किया गया। स्वामी दयानन्द से श्रीअरविन्द तक सभी ज्ञानी उपेक्षणीय, हानिकारक करार दिए गए।

सौ सालों से भारत में यही चल रहा है। इसीलिए ‘समाजवाद’ से लेकर ‘वर्ण-संघर्ष’, ‘संपूर्ण क्रांति’, ‘सामाजिक न्याय’, ‘विकास’ तक नीति-निर्धारण नेताओं ने स्वयं कर लिया! उन्हें कभी किसी ज्ञानी, मनीषी की सलाह देखने, समझने की इच्छा नहीं हुई। समकालीन विदेशी उदाहरणों से भी कुछ नहीं सीखा गया। बल्कि गाँधी तो हिटलर और चर्चिल को भी विकृत कर, अपने मत-माफिक प्रस्तुत करते थे। उन के अंतर से कुछ समझना तो दूर रहा!

वही मनोवृत्ति, कारखानों को ‘मंदिर’ कहने वाली समझ अभी भी बदस्तूर है जो ‘संविधान को धर्मग्रंथ’ बताती है। लेकिन तब उपनिषद और गीता क्या हैं? संभवतः गल्प या अंधविश्वास, यानी अप्रासंगिक! कुछ यही नेहरू भी समझते थे। उस नासमझी का भी आज खूब विकास हो गया है।

इसीलिए, हमारे शिक्षा-नीतिकारों को भी पता नहीं कि निराला का ‘तुलसीदास’, सोल्झेनित्सिन का ‘गुलाग आर्किपेलाग’ या सीताराम गोयल का ‘हिन्दू टेम्पल्सः ह्वाट हैपेन्ड टु देम…’ किसलिए, या किस के लिए लिखे गए? बल्कि अधिकांश नीति-निदेशकों ने ये नाम भी न सुने हों, तो कोई अजब नहीं। तब नेताओं से क्या उम्मीद, जो विकास को जन गण की एक मात्र आकांक्षा समझते हैं।

किन्तु यदि ‘सब रोगों की एक दवा – विकास’ है, तब कश्मीर या पंजाब में गड़बड़ी क्या है? पंजाब सब से विकसित राज्यों में एक, और कश्मीर भी सब से सुंदर, समृद्ध। खोजने पर भी कोई कश्मीरी, पंजाबी भिखारी नहीं मिलेगा। इतने ‘विकसित’ होकर भी एक इस्लामी अलगाववाद तो दूसरा नशा-खोरी व कन्या भ्रूण-हत्या से ग्रस्त है।

बल्कि खालिस्तानी आंदोलन के मुख्य दौर में पंजाब का विकसित होना भी उस की अलगाववादी सोच का एक आधार था! वे मानते थे कि पंजाब तो कैलिफोर्निया बन सकता है, अगर यह पिछड़े भारत से अलग हो जाए। अतः निरा भौतिकवादी विकास खुद एक रोग है। इसीलिए, धनी परिवारों के बच्चे नशा, कुटेव, व्यभिचार और मूल्यहीन, दिशाहीन जीवन के आदी बन रहे हैं।

यह मानना भयंकर भूल है कि मनुष्य को रोजगार, पैसा, सड़क, बिजली, आदि के सिवा कुछ नहीं चाहिए। या, जब तक ये न मिले, तब तक कुछ और नहीं। शिक्षा भी इन्हीं चीजों की प्राप्ति का साधन मान ली गई है। यह सब वेश-बदला पुराना कम्युनिस्ट प्रमाद ही है, जो ‘विकास’ नाम से चल रहा है। यह मनुष्य को केवल भौतिक शरीर समझता है। मानो गरीब आदमी को साहित्य, कला या धर्म (नैतिकता) की जरूरत नहीं। अतः मार्क्स द्वारा धर्म को ‘अफीम’ कहना और ‘देवालय से शौचालय महत्वपूर्ण’ बताने में कोई बुनियादी अंतर नहीं है।

यहीं सांस्कृतिक उजड्डता का, ज्ञानियों, मनीषियों की उपेक्षा का प्रश्न उठता है। कोएनराड एल्स्ट जैसे विद्वान की उपेक्षा इस का प्रतिनिधि उदाहरण है। इस से बड़ी विडंबना क्या, कि गत तीन दशक से हिन्दुत्व से जुड़े प्रश्नों पर सब से अधिक लोहा जिस ने लिया, जिस की प्रमाणिकता देश-विदेश में अन्यतम है, वह आज भी दर-दर का मुँह जोहने को विवश है! अयोध्या-विवाद, सेक्यूलरिज्म, सांप्रदायिक दंगे, इतिहास का मार्क्सवादी विकृतिकरण, संघ-परिवार पर फासिज्म का लांछन, आर्य-आक्रमण सिद्धांत व इस आड़ में भारत-विखंडनकारी अकादमिकता, तथा दलितवाद के नाम पर चर्च-मिशनरी दुष्प्रचार – इन सभी विषयों पर किसी ने इतना और लगातार काम नहीं किया, जितना अकेले कोएनराड एल्स्ट ने!

लेकिन ऐसे विद्वान का मोल हमें नहीं पता, क्योंकि हमारा संस्कृति-बोध शून्य है! सब नेता ‘विकास’ के पीछे यूँ ही मतवाले नहीं। वे जनता को केवल वोटर और शरीर-धारी भोगी समझते हैं। जबकि प्राचीन से समकालीन मनीषियों तक ने बार-बार चेताया कि मनुष्य केवल शरीर नहीं। उस की आत्मा, मन और चरित्र भी महत्वपूर्ण है। इस में गरीब-अमीर का भेद नहीं उठता। सत्यनिष्ठा, सेवा, न्याय, आदि भाव गरीब में भी मिलते हैं, अमीर में भी। उसी तरह, झूठ, स्वार्थ, अनाचार से ग्रस्त गरीब-अमीर दोनों प्रकार के होते हैं। ऐसे उदाहरण रोज दिखने पर भी नीति-नियंता इस पर कुछ नहीं सोचते। कारण, उन के रडार पर संस्कृति-चेतना नहीं है। इसीलिए एल्स्ट का मोल दौ कौड़ी है।

वस्तुतः मनुष्य को नीति, धर्म और दर्शन की भी आवश्यकता होती है। अबोधावस्था से निकलते ही होती है। यह उसे देना ही शिक्षा कहलाता था। पर स्वतंत्र भारत में सत्ताधीशों ने उन्नति के अंधविश्वास में शिक्षा का भी अर्थ बिगाड़ दिया। रोजगार-तैयारी और ट्रेनिंग को ही ‘शिक्षा’ की संज्ञा दे दी गई। हमारी भाषाओं की, और फलतः संस्कृति की दुर्गति उसी का कुफल है। आज इसी अज्ञान-राग पर संपूर्ण विकास-धुन बज रही है। मानो, हर किसी को खाने-पहनने, मोबाइल और मनोरंजन के सिवा कुछ जरूरी न हो। या बाकी खुद-ब-खुद पूरी हो जाएंगी।

देश और दुनिया का अनुभव इस के ठीक विपरीत है। स्वतंत्रता-पूर्व भारत में सब से विकसित राज्य थे बंगाल व पंजाब। दोनों टूटे। लाखों को मारा, अन्य लाखों को बेघर किया। यह अंग्रेजों ने नहीं, पंजाबियों ने पंजाबियों और बंगालियों ने बंगालियों को मारा। चाहे मरने, मारने वाले दो विभिन्न मत-विश्वासों के थे। यदि ‘विकास’ उन्हें सुरक्षित रख सकता तो लाहौर और ढाका बर्बाद न हुए होते।

यही अंतर्राष्ट्रीय परिदृश्य भी है। यूरोप और अमेरिका सब से विकसित हैं। तब वहाँ दो पीढियों से रहने वाले संपन्न, सुशिक्षित मुसलमान भी क्यों जिहाद में मरने सारी दुनिया जाते हैं? अपने ही देश को बम-बंदूकों से तबाह कर ‘निजामे-मुस्तफा’ बनाना चाहते हैं? या, अभी ब्रिटेन ने विकास प्रलोभन ठुकरा कर यूरोपीय संघ की सदस्यता क्यों छोड़ी? क्योंकि मनुष्य के लिए सांस्कृतिक मूल्य जरूरी ही नहीं, निर्णायक भी हैं। नहीं तो अंग्रेजों को भगाने की कोई जरूरत न थी। श्रीअरविन्द ने (गाँधी-विचार के विरुद्ध) कहा था कि यदि अंग्रेज स्वर्गोपम व्यवस्था बनाएं, तब भी उन का शासन भारतवर्ष अस्वीकार करेगा।

यह सब अव्यवहारिक बातें नहीं। कवि अज्ञेय ने लिखा था, ‘तुम गरीब आदमी से फिलॉसफी की बात नहीं कर सकते, मगर गरीब तो तुम से फिलॉसफी की बात कर सकता है!’ मगर ऐसे ज्ञानियों का यहाँ आदर नहीं हुआ। सत्ताधारियों ने उन्हें कुछ समझा ही नहीं! ‘समाजवाद’ से लेकर ‘विकास’ के अहंकार में नेताओं ने खुद को ही ज्ञानी माने रखा। तभी यहाँ चौरतफा झूठ, अपराध, अलगाव, दंगे और इस्लामवादी बुखार का इलाज नहीं खोजा जा सका है।

सांस्कृतिक पराधीनता में राजनीतिक दृष्टि भी धुँधली रहती है। यह आज दुनिया के देशों के उदाहरण से भी समझा जा सकता है। सब से सम्मानित वे हैं, जो सांस्कृतिक-भाषाई दृष्टि से भी स्वाधीन हैं। नकलची ‘मैसी साहब’ आज भी दया के पात्र हैं, चाहे शिष्टाचार-वश उन्हें यह सदैव जताया नहीं जाता।

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Source: यह विकास नहीं सांस्कृतिक गुलामी है! – Naya India

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